पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने महोत्सव को बनाया यादगार

                    महोत्सव का चैथा और अन्तिम दिन लोक कलाओं से भरा रहा। महोत्सव की आखिरी शाम लोकगायिका मालिनी अवस्थी के नाम रही। मालिनी अवस्थी के स्टेज पर आते ही खचाखच भरा पण्डाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। मालिनी अवस्थी ने अपनी प्रस्तुति सबसे पहले देवी गीत देवी मोरी झूलै लौंग की डरिया तथा उड़ि जाव सुगना सरयू पार मनाय लावो देबिन को गाकर देवी वन्दना की। इसके बाद लोकगीतों की परम्परा के तमाम विधाओं के गीत उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए जिस पर दर्शक झूम उठे। उनके द्वारा सोहर बाजत अवध बधइया दशरथ घर सोहर हो, हे रामा घर-घर बाजे ला बधइया हे रामा, रेलिय बैरन पिया को लिये जाय रे, हमरा गुलाबी दुपट््टा, हमे लगि जइहै नजरिया हो, नई झुलनी की छइयां दो घरिया बिताय दा हो, येहि ठइयां मोतिया हेरा गईल रामा, कहवां मैं ढूंढूं। देवी गीत मइया के भावै लाल सेनुरवा हो जगदम्बा मइया, सइयां मिले लरिकइयां मैं का करूं तथा पिया मेंहदी लियाय दा मोती झील से जायके साइकिल से नाय गााकर लोगों का मनमोह लिया तथा पूरे पण्डाल को जीवन्त बना दिया। उनके लोकगीतों की झमाझम प्रस्तुति की गई। जिलाधिकारी जेबी सिंह व उनकी धर्मपत्नी तथा पुलिस अधीक्षक उमेश कुमार सिंह ने मालिनी अवस्थी को चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया।
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